क्या ख़तो- किताबत का होगा, ये रिश्ते हैं, पल दो पल के, हैं आज अगर ये जिंदा तो, क्या शर्त है कल तक जीने की। ये आसमान […]
क्या ख़तो- किताबत का होगा, ये रिश्ते हैं, पल दो पल के, हैं आज अगर ये जिंदा तो, क्या शर्त है कल तक जीने की। ये आसमान […]
फिर भी कितनी अनजान हूँ तुमसे। ख़्वाबों में ख़्यालों में शिकवों में गिलों में मेंहदी में फूलों में सावन के झूलों में झरनों के पानी में नदियों […]
…और कभी मैं घर को लौटूँ, तुम दालान के बाहर। उस छोटी सी मुंडेर पे, जिसपे हर शाम परिंदे आ-आकार। कुछ दाने से चुन आते हैं, वक्ते […]
पकती उम्रों को ये एहसास दिलाने होंगे नई आँखों में नए ख़्वाब सजाने होंगे खारा पानी है सो आओ इसे मीठा कर लें अब तो दरिया में […]
यूँ भी हम अपनी हर इक रात बसर करते हैं आपकी याद के साये में सफर करते हैं एक ही लम्हा गुज़र जाये तेरे साथ कभी इसी […]
यूँ भी हम अपनी हर इक रात बसर करते हैं आपकी याद के साये में सफर करते हैं एक ही लम्हा गुज़र जाये तेरे साथ कभी इसी […]
हमारे शह्र में हर अजनबी, इक हमजबां चाहे मगर कुछ है जो बाशिन्दा यहाँ का दरमियां चाहे उम्मीदें मंज़िलों की अब तो हमको ज़र्द लगती हैं ख़बर […]
रेज़ा रेज़ा ख़्वाब हो गये कस्मे वादे कहीं खो गये हर लम्हा इक युग सा बीता जब से वो परदेस को गये एक बोझ था जीवन अपना […]
मुंतजिर सी रात थी, थक हार के अब सो गई आस जो आने की थी, वीरानियों में खो गई चाँद से इक बार फिर, क्यूँ हो गया […]
यक तरफा फैसला मुझे मंजूर हो गया मैं उसकी जिन्दगी से बहुत दूर हो गया माँ की इनायतें रहीं ताउम्र इसी तरह मैं तीरगी से जब भी […]