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किसकी कहें, हालात से अपने कौन यहाँ बेज़ार नहीं

किसकी कहें, हालात से अपने कौन यहाँ बेज़ार नहीं ग़म से परेशाँ सब मिलते हैं, पर कोई ग“मख़्वार नहीं या तो मंजि’ल दूर हो गयी, या फिर […]

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ज’रा सी चोट को महसूस करके टूट जाते हैं

ज’रा सी चोट को महसूस करके टूट जाते हैं सलामत आईने रहते हैं चेहरे टूट जाते हैं पनपते हैं यहाँ रिश्ते हिजाबों एहतियातों में बहुत बेबाक होते […]

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तुम्हें पाने की धुन इस दिल को यूँ अक्सर सताती है

तुम्हें पाने की धुन इस दिल को यूँ अक्सर सताती है बंधी मुट्ठी में जैसे कोई तितली फड़फड़ाती है चहक उठता है दिन और शाम नग्में गुनगुनाती […]

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वो अक्सर मेरे सब्रो-ज“ब्त को यूँ आज’माते हैं

वो अक्सर मेरे सब्रो-ज“ब्त को यूँ आज’माते हैं हवा जख़्मों को देकर फिर नमक उन पर लगाते हैं यहाँ तो हर घड़ी हर सिम्त इक हंगामा बरपा […]

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