दर्द कौन समझेगा

दर्द कौन समझेगा

तूने बख़्शा तो है
मुझे
खुला आसमां
साथ ही दी हैं
तेज’ हवाएं भी
हाथों से हल्की जुम्बिश
देकर जमीं से ऊपर उठा
भी दिया है।
मगर
ये सब कुछ बेमतलब
सा लगता है,
ये आस्मां, ये हवाएं, ये
हल्की सी जुम्बिश।
काश!
तूने ये कुछ न दिया होता
बस मेरी कमान खोल दी
होती,
एक धागा है कि
जिसने बदल दिए हैं
मेरी आज़ादी के मायने,
डोर से बंधी पतंग का
दर्द कौन समझेगा।
(महिला दिवस पर दुनिया की आधी आबादी के नाम)