मुंशी प्रेमचंद जी, को याद करते हुए………!!!!
लमही गाँव (वाराणसी) में 31 जुलाई 1880 को जन्में प्रेमचंद का पारिवारिक व्यवसाय कृषि , निर्धनता के कारण डाकघर में काम करना पड़ा. उनका मूल नाम धनपत राय था. उर्दू में पढ़ाई शुरू करने वाले प्रेमचंद ने उर्दू में ही अपना लेखन शुरू किया और कई पुस्तकों का उर्दू में अनुवाद किया. प्रेमचंद ने अध्यापन को अपना पेशा बनाया. लेखन के अलावा उन्होंने मर्यादा, माधुरी, जागरण और हंस पत्रिकाओं का संपादन भी किया. सरस्वती के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी से मिली प्रेरणा के कारण उन्होंने हिन्दी उपन्यास सेवासदन लिखा तदोपरांत प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कर्मभूमि और गोदान छपा. गोदान को प्रेमचंद की सबसे परिपक्व कृति मानी जा सकती है.
प्रेमचंद की सोहबत तो अच्छी लगती है लेकिन उनकी सोहबत में तकलीफ़ बहुत है…
हम को भी और जिनको आप ने पीस पीस के मारा
दर्द दिए हैं आप ने हम को मुंशी जी‘
होरी’ को पिसते रहना और एक सदी तक पोर पोर दिखलाते रहे हो
किस गाय की पूंछ पकड़ के बैकुंठ पार कराना था
सड़क किनारे पत्थर कूटते जान गंवा दी
और सड़क न पार हुई, या तुम ने करवाई नही की
कहती रही डूबना ही क़िस्मत में है तो बोल गढ़ी क्या और गंगा क्या
तीन तीन पुश्तों को बंधुआ मज़दूरी में बांध के तुमने क़लम उठा ली‘शंकर महतो’ की नस्लें अब तक वो सूद चुकाती हैं.‘ठाकुर का कुआँ’, और ठाकुर के कुएँ से एक लोटा पानीएक लोटे पानी के लिए दिल के सोते सूख गए‘झोंकू’ के जिस्म में एक बार फिर ‘रायदास’ को मारा तुम ने
मुंशी जी आप विधाता तो न थे, लेखक थेअपने किरदारों की क़िस्मत तो लिख सकते थे?’