कमलेश भट्ट – संस्कृति के padaaw

कमलेश भट्ट – संस्कृति के padaaw

ऐसा कम ही होता है कि किसी किताब को आप एक बार में ही पढ़ जायें। संस्कृति के पडाव एक ऐसी ही कृति है जिसे मैंने एक सिटिंग में पढ़ डाला। दरअसल यह किताब मुझे कल ही कमलेश भट्ट कमल ने दी जो सौभाग्य से इसके लेखक भी हैं। इस किताब की सबसे ख़ास बात यह है कि लेखक कमलेश जी एक साहित्यिक कार्यक्रम संगमन में शामिल होने के लिए गाँधी नगर जाते हैं और उनकी पूरी yatra के दौरान जो भी कुछ घटता है उसको वे बड़े ही रोचक ढंग से व्यक्त करते हैं। कमलेश जी उ प्र सरकार के मुलाजिम हैं। अलीगढ से उनकी यात्रा शुरू होती है और गाँधी नगर समाप्त होती है । इस यात्रा के बीच में वे जिस नगर गाँव परिवेश से गुजरते हैं बड़ी तसल्ली के साथ उसके साहित्यक सांस्कृतिक और सामाजिक पहलु को स्पर्श करते हैं। उनकी यात्रा रेल में दूसरे दर्जे में वेटिंग लिस्ट वाले एक ऐसे यात्री की कहानी के साथ शुरुआत होती है जो अपनी यात्रा के पहले कदम से ही कई मुश्किलों से जूझता है।बर्थ के नाम पर अखवार पर सोते हुए सफर करने की कठिनाई को भी वे सहजता से लेते हैं। फिर जिस भी स्टेशन से ट्रेन गुजरती है उसे वे उसके इतिहास से लेकर वर्तमान तक जुड़ते हैं। इस दौरान वे प्रसंग वस ऐसे स्थानों के विषय में भी लिखते हैं जो यात्रा में तो नही पड़ते लेकिन उनका ज़िक्र ज़रूरी हो जाता है। गाँधी के प्रदेश और उनके नगर उनके आश्रम में वे क्या महसूस करते हैं उसका भी वर्णन इस किताब में बखूबी किया गया है। संगमन के बहने वे हिन्दी और गुजरती भाषा के ज़रूरी हस्ताक्षरों के विषय में वे बड़ी तफ्शील से गुफ्तगू करते हैं। दोषी – हुसैन गुफा ,अक्षर धाम मन्दिर ,राज्वादु भोज, अदलज कुआँ , सुप्रीम कोर्ट और परेशानी के लम्हों में जनहित सम्बन्धी उसके निर्णयों से लेखक की उम्मीदे इस किताब की रोचक घटनाये हैं।
अक्षर धाम मन्दिर देखते समय धर्म और आस्था के बीच झूलते आम आदमी की भ्रम की स्थिति को वे सहज भाव से व्यक्त करते हैं। यदि हम गंभीर विमर्श की बात करे तो वे डंडी यात्रा , वाली दखिनी ,अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पर भी लिखने में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ अपनी बात कहीं चुपके से कह ही जाते हैं .यही उनकी लेखकीय कुशलता है।कस्तूरबा के विषय में ग्यारह पन्नों का दस्तावेज़ इस किताब की बेहतरीन प्रस्तुति है। आम तौर पर गाँधी जी के विषय में बहुत कुछ पढने को मिल जाता है लेकिन बा के विषय में कम ही लिखा पढ़ा गया है।
अंत में अपने और लेखक के विषय में …….कमलेश भाई से मेरी मुलाकात बरेली से है । वे वहां व्यापार कर samyukt आयुक्त थे और मैं upzila adhikari था। कई mulakaten उनसे होती थी बरेली में लेकिन हमारी guftgu का केन्द्र बिन्दु sahitya ही होता था। सरकारी naukari के साथ lekhan कार्य mushkil काम होता है लेकिन वे इस zimmedari को निभा रहे हैं। haiku विधा में वे एक aandolan की bhumika tyyar कर चुके हैं.मैं चाहता हूँ की उनकी lekhan यात्रा aviraam chalti रहे । subhkamnaon के साथ उनके lekhan को naman..