जगजीत सिंह- “मैं भूल जाऊं तुम्हें…. ये कहाँ मुनासिब है !”

क्या पता था कि गजल सम्राट जगजीत सिंह का 3 सितम्बर 2011 तालकटोरा स्टेडियम का कन्सर्ट हमारे लिए आखिरी ’शो ’ साबित होगा (वैसे इसके बाद शायद उन्होंने एक दो शो और किये मगर इस शो में मैंने उन्हें सुना था इसलिए मैं इसे अपनी नज़र में आखरी शो मान रहा हूँ….). कल 10 बजे अचानक जब अग्रज सुमति मिश्र का मोबाईल मैसेज मिला “जगजीत सिंह इज नो मोर” तो लगा कि शरीर को अचानक लगवा मार गया हो. उस समय मैं लखनऊ में एक बैठक में था, महज तस्दीक करने के लिहाज से शायर दोस्त आलोक श्रीवास्तव (जिनकी ग़ज़ल हाल ही में जगजीत सिंह ने गायी थी…) से मैसेज करके पूछा कि “क्या यह खबर सच है “? उन्होने एक लफ्ज में ज्यों ही मुझे यह उत्तर लिखा- “जी”…….. लगा जैसे सर पे आसमान गिरा हो……उनकी तबियत विगत तेईस तारीख से ख़राब थी और वे अस्पताल में भर्ती भी थे…..मगर ये सब इतनी जल्दी हो जायेगा इसका तो सपने में भी भान नहीं था.

सच तो यह है कि जगजीत सिंह को सुन-सुन कर हमारी पीढ़ी का लगाव ग़ज़ल से हुआ. ये लगाव ऐसा था कि उनकी गाई गजले हमें जुबानी याद थीं. मैं अपनी बात जानता हूँ कि पहले मैं मेंहदी हसन साहब के अलावा किसी को भी नहीं सुनता था……. सत्रह अट्ठारह बरस पहले तब के मेरे स्कूल सखा और आज के नामी पत्रकार मित्र मोहित दुबे ने जगजीत सिंह को सुनने के लिए प्रेरित किया और इसके बाद तो जगजीत सिंह से ऐसा राबता कायम हुआ कि आज तक बदस्तूर जारी है……..! विगत 18 वर्षो में जगजीत सिंह साहब के लगभग पांच लाइव शो मैंने देखे…….. उनका हर बार वहीं जोशीला अन्दाज, कड़क व्यवहार , मखमली आवाज ,गाते हुए बन्द आंखे- कांपते होंठ, बीच-बीच में गुदगुदाने वाले चुटकुले, जनता की मांग पर ग़ज़लों के बीच पंजाबी गीतों का तड़का …. ! मगर अब मैं महसूस करता हूँ कि यह सब एक झटके में ख़तम हो गया है……! हमारी पीढी के बहुत से लोगों के लिए तो गजल गायकी में जगजीत सिंह के अलावा ’ न भूतो न भविष्यति ’ वाली स्थिति रही..! मेरे कई मित्रों कि पसंदगी का आलम यह था कि उनके सिवा किसी और गायक की गज़लें सुनना भी उन्हें गवारा नहीं था. कैसेट के दौर से लेकर सीडी के दौर तक जगजीत सिंह ने जो भी गाया वो हमें रिलीजियसली खरीदना ही था…….!

एक नज़र इस महान गायक के जीवन वृत्त पर…….. 8 फरबरी 1941 को गंगानगर में जन्मे जगजीत सिंह के पिता सरदार अमर सिंह धमानी भारत सरकार के कर्मचारी थे, मां बच्चन कौर थीं. उनकी आरंभिक शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद पढ़ने के लिए जालंधर आ गए. डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया. पिता से संगीत विरासत में मिला. उनके इस हुनर को गंगानगर के पंडित छगन लाल शर्मा ने तराशा……. बाद में उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं. वे 1965 में मुम्बई आ गये. शुरूआती संघर्ष के बाद 1969 में चित्रा सिंह जी के साथ परिणय सूत्र में बंध गए. उनका पहला एलबम ‘द अनफ़ॉरगेटेबल्स (1976)’ आया तो उनकी गायकी ने धूम मचा दी जो उनके अंत समय तक जारी रही.
फारसी- उर्दू भाषा जानने वालों की मिल्कियत समझी जाने वाली, नवाबों की महफ़िलों में इतराती ग़ज़लों को आम आदमी तक पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को पहले पहल दिया जाना हो तो जगजीत सिंह का ही नाम ज़ुबां पर आता . उनकी ग़ज़लों ने न सिर्फ़ उर्दू के कम जानकारों के बीच शेरो-शायरी की समझ में इज़ाफ़ा किया बल्कि ग़ालिब, मीर, मजाज़, जोश और फ़िराक़ जैसे शायरों से भी उनका परिचय कराया. जगजीत सिंहको सन 2003 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया गया.

जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को अपेक्षाकृत उप शास्त्रीय ढंग से गाना शुरू किया तो यह बिलकुल अभिनव कदम था…… क्योंकि अब तक ग़ज़ल को परंपरागत वाद्यों के साथ ही गया जाता था मगर उन्होंने जब फ़िल्मी गानों की ऑक्टोपेड, वायलिन और कीबोर्ड पर ग़ज़ल गाने का प्रचलन तब नहीं था. कहकशां और फ़ेस टू फ़ेस एल्बम में जगजीत जी ने कुछ ग़ज़लों में कोरस का इस्तेमाल कर एक और प्रयोग किया.

कोई एक हो तो कोट करूँ उनका हरेक एलबम पुराने से बीस ही बैठता है……. सुनने वाले जानते है कि इनसाइट,सिलसिले, सजदा, मरासिम,कोई बात चले, कहकशां, साउंड अफ़ेयर, डिफ़रेंट स्ट्रोक्स, मिर्ज़ा ग़ालिब में यह तय कर पाना नामुमकिन है कि कौन एलबम ज्यादा बेहतर है……! मीर- ग़ालिब से लेकर आज के दौर के सभी नामचीन शायरों को उन्होंने कम्पोज किया…..!
‘प्रेमगीत’ और ‘अर्थ’ ने उन्हें लोकप्रियता की पहली पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया….. बाद में उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीत और गायन दोनों किये….! लीला, ख़ुदाई, बिल्लू बादशाह, क़ानून की आवाज़जैसी फिल्मों में संगीत दिया तो वहीँ ‘प्रेमगीत’ का ‘होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो, ‘खलनायक’ का ‘ओ मां तुझे सलाम’,’दुश्मन’ का ‘चिट्ठी ना कोई संदेश’,‘जोगर्स पार्क का ‘बड़ी नाज़ुक है ये मंज़िल’, ‘साथ साथ’ का ‘ये तेरा घर, ये मेरा घर’ और ‘प्यार मुझसे जो किया तुमने’,’सरफ़रोश’ का ‘होशवालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है’ ‘पिंजर’ का ‘हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते’,’तुम बिन’का ‘कोई फ़रयाद तेरे दिल में दबी हो जैसे, बाबुल का गीत गाकर फ़िल्मी गीतों को मिठास से भर दिया.

आज उनको याद करते हुए निदा फाजली साहब कि नज़्म सहसा आँखों के सामने घूम रही है…. यह नज़्म उन्होंने इनसाईट में गाई थी….—–

ये ज़िन्दगी
आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी.बड़ी नसों में
मचल रही है
तुम्हारे पैरों से चल रही है
तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है
ये ज़िन्दगी
जाने कितनी सदियों से
यूँ ही शक्लें
बदल रही है
बदलती शक्लों
बदलते जिस्मों में
चलता.फिरता ये इक शरारा
जो इस घड़ी
नाम है तुम्हारा
इसी से सारी चहल.पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा
सितारे तोड़ो या घर बसाओ
क़लम उठाओ या सर झुकाओ
तुम्हारी आँखों की रोशनी तक
है खेल सारा

ये खेल होगा नहीं दुबारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा

कृतज्ञ राष्ट्र की गजल सम्राट जगजीत सिंह को भावभीनी श्रद्धांजलि…..! लगता है कि एक युग का अन्त हो गया उनके साथ…!!!!

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