जगजीत सिंह- “मैं भूल जाऊं तुम्हें…. ये कहाँ मुनासिब है !”
सच तो यह है कि जगजीत सिंह को सुन-सुन कर हमारी पीढ़ी का लगाव ग़ज़ल से हुआ. ये लगाव ऐसा था कि उनकी गाई गजले हमें जुबानी याद थीं. मैं अपनी बात जानता हूँ कि पहले मैं मेंहदी हसन साहब के अलावा किसी को भी नहीं सुनता था……. सत्रह अट्ठारह बरस पहले तब के मेरे स्कूल सखा और आज के नामी पत्रकार मित्र मोहित दुबे ने जगजीत सिंह को सुनने के लिए प्रेरित किया और इसके बाद तो जगजीत सिंह से ऐसा राबता कायम हुआ कि आज तक बदस्तूर जारी है……..! विगत 18 वर्षो में जगजीत सिंह साहब के लगभग पांच लाइव शो मैंने देखे…….. उनका हर बार वहीं जोशीला अन्दाज, कड़क व्यवहार , मखमली आवाज ,गाते हुए बन्द आंखे- कांपते होंठ, बीच-बीच में गुदगुदाने वाले चुटकुले, जनता की मांग पर ग़ज़लों के बीच पंजाबी गीतों का तड़का …. ! मगर अब मैं महसूस करता हूँ कि यह सब एक झटके में ख़तम हो गया है……! हमारी पीढी के बहुत से लोगों के लिए तो गजल गायकी में जगजीत सिंह के अलावा ’ न भूतो न भविष्यति ’ वाली स्थिति रही..! मेरे कई मित्रों कि पसंदगी का आलम यह था कि उनके सिवा किसी और गायक की गज़लें सुनना भी उन्हें गवारा नहीं था. कैसेट के दौर से लेकर सीडी के दौर तक जगजीत सिंह ने जो भी गाया वो हमें रिलीजियसली खरीदना ही था…….!
जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को अपेक्षाकृत उप शास्त्रीय ढंग से गाना शुरू किया तो यह बिलकुल अभिनव कदम था…… क्योंकि अब तक ग़ज़ल को परंपरागत वाद्यों के साथ ही गया जाता था मगर उन्होंने जब फ़िल्मी गानों की ऑक्टोपेड, वायलिन और कीबोर्ड पर ग़ज़ल गाने का प्रचलन तब नहीं था. कहकशां और फ़ेस टू फ़ेस एल्बम में जगजीत जी ने कुछ ग़ज़लों में कोरस का इस्तेमाल कर एक और प्रयोग किया.
आज उनको याद करते हुए निदा फाजली साहब कि नज़्म सहसा आँखों के सामने घूम रही है…. यह नज़्म उन्होंने इनसाईट में गाई थी….—–
ये ज़िन्दगी
आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी.बड़ी नसों में
मचल रही है
तुम्हारे पैरों से चल रही है
तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है
ये ज़िन्दगी
जाने कितनी सदियों से
यूँ ही शक्लें
बदल रही है
बदलती शक्लों
बदलते जिस्मों में
चलता.फिरता ये इक शरारा
जो इस घड़ी
नाम है तुम्हारा
इसी से सारी चहल.पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा
सितारे तोड़ो या घर बसाओ
क़लम उठाओ या सर झुकाओ
तुम्हारी आँखों की रोशनी तक
है खेल सारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा