Archive for Category: नज़्में

ख़्वाब

ख़्वाब शीशे के टुकड़े हैं टूटते हैं तो पलकें लहूलुहान हो जाती हैं मैं इस डर से कभी आँखों में ख़्वाब नहीं सजाता हूँ।

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हाशिया

बेसबब पहले काग“ज’ पे वो हाशिया खींच देता है और उसपे ये दावा कि वो बंदिशों में लिखने का आदी नहीं है!

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मसूरी

मसूरी एक निहायत खूबसूरत दोशीजा जिसके माथे पर सूरज की लाल बिन्दी है, तो तमाम तराशे हुए कुहसार उसके अल्हड़पन के गवाह हैं। मसूरी! जब सुबह चांदी के वरक’ से ढके बादलों की चूनर ओढ़ती है तो और भी खूबसूरत हो जाती हे कैम्पटी फॉल के नग्“मात के साथ...

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अरबी आयतें और ईशी

दो सौ साठ रातों के वे तमाम ख़्वाब जिनको हमने सोते-जागते उठते-बैठते ख़यालों में या बेख़याली में देखा था आज पूरे सात सौ तीस रोज’ के हो गए हैं ख़्वाबों को बुनना और बुनने के बाद उन्हें पहनना कितना ख़ुशगवार होता है आज तुम सात सौ तीस रोज’ की...

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उसे बदलना ही था

उसे बेवफ़ा होना ही था, मुझसे सिलसिला तोड़ना ही था कोई राब्ता रखना ही न था, दो क’दम साथ चलना भी न था एक रोज उसे बदल ही जाना था और एक रोज’ मुझे संभल ही जाना था। वफ़ा की राह में वो चल न पाएगा, मुझे यकीन था,...

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नक़्श कितने जुदा हैं

ज़ात घर घराना मुल्क पैदाइश माँ और भी कई फि’तरतें इंसानी हों या ख़ुदाया एक सी होने के बावजूद उन दोनों के नक़्श कितने जुदा हैं। एक ही पहाड़ी दोनों की माँ है एक ही मुल्क इन दोनों की पहचान है, पैदाइश भी दोनों की एक सी है, और...

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यादें

बड़ी बेशऊर हैं तुम्हारी यादें न दस्तक देती हैं और न ही आमद का कोई अंदेशा न कोई इशारा और न कोई संदेसा गाहे-ब-गाहे वक्त-बे-वक्त दिन-दोपहर हर वक्त हर पहर दिल की दहलीज’ पर हौले से पाँव रखती है, थम-थम के पैर उठाती हुई न जाने कैसे किस तरफ’...

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अमानत

परत-दर-पर तह-ब-तह ज़िन्दगी-ज़िन्दगी…। यही इक अमानत मुझे बख़्शी है मेरे खुदा ने। इसी में से ये ज़िन्दगी यानी ये उम्र अपनी तेरे नाम कर दी है मैंने। मगर सुन ज़रा यह तो बस पेशगी है, जो तू हां कहे तो यह सारी अमानत तेरे नाम कर दूँ।

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आसमां

आसमां जहाँ तक देखो बस एक सा दिखता है कहीं वो ख़ाने नहीं हैं इसमें जिनमें कि ये बँटा हो कोई लकीर नहीं है कोई पाला भी नहीं है कि जिससे साबित हो सके इधर का हिस्सा हमारा उधर का तुम्हारा। भरी आँखों तक बस एक सा दिखता है।...

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रात

वक्त के मेले में जब भी रात घूमने निकलती है न जाने क्यूँ हर बार अपने कुछ बेटों को जिन्हें ‘लम्हा’ कहते हैं छोड़ आती है। ये गुमशुदा लम्हे हर रात अपनी माँ की तलाश में जुगनू की शक्ल इख़्तियार करके भटकते रहते हैं, मचलते रहते हैं।

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