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वो अक्सर मेरे सब्रो-ज“ब्त को यूँ आज’माते हैं

वो अक्सर मेरे सब्रो-ज“ब्त को यूँ आज’माते हैं हवा जख़्मों को देकर फिर नमक उन पर लगाते हैं यहाँ तो हर घड़ी हर सिम्त इक हंगामा बरपा […]

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जहां हमेशा समंदर ने मेहरबानी की

जहां हमेशा समंदर ने मेहरबानी की उसी ज’मीन पे कि’ल्लत है आज पानी की उदास रात की चौखट पे मुन्तजिर आँखें हमारे नाम मुहब्बत ने ये निशानी […]

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