Archive for Category: कतरन

मुख़्तारी तो ऐसे भी दिख जाती है , आंगन में बंदूकें बोना ठीक नहीं

पवन कुमार की ग़ज़लों में जो सादगी , सलोनापन और सलाहियत है वो हमें ज़िंदगी के शोर से एक नामुमकिन सी मुक्ति देती मिलती है । इन ग़ज़लों की कहन में जो तड़प , जो तेवर , जो तंज और जो तग़ाफ़ुल है वह नसों को तड़का-तड़का देती है...

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बँधी मुट्ठी में जैसे कोई तितली फड़फड़ाती है – पवन कुमार

शायर पवन कुमार का दमदार आग़ाज़ “वाबस्ता समीक्षा – मयंक अवस्थी प्रकाशन संस्थान, 4268-B/3, दरिया गंज नई दिली -110002 बँधी मुट्ठी में जैसे कोई तितली फड़फड़ाती है – पवन कुमार जैसी कि मेरी आदत है पुस्तक पढने के पहले मैने पवन कुमार जी की पुस्तक “वाबस्ता” के भी बीच...

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