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मुख़्तारी तो ऐसे भी दिख जाती है , आंगन में बंदूकें बोना ठीक नहीं

पवन कुमार की ग़ज़लों में जो सादगी , सलोनापन और सलाहियत है वो हमें ज़िंदगी के शोर से एक नामुमकिन सी मुक्ति देती मिलती है । इन ग़ज़लों की कहन में जो तड़प , जो तेवर , जो तंज और जो तग़ाफ़ुल है वह नसों को तड़का-तड़का देती है...

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