Archive for Category: नज़्में

वक्त पर

वक्त पर थम गई है बारिश जो गुज“री रात को हुई थी, धो दिए हैं रास्ते इस बारिश ने। सूरज भी खूब वक्त से निकला है, किरनें बिखरा दी हैं हरसू फि’ज़ाओं में। संदली खुश्बू भी बिखर गई है हवाओं में। देर तक शाख़ों के बिस्तर पर सोते रहने...

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ख़त

जाने क्या सोच के तेरे ख़त कल नदी में बहाये थे, ख़त तो काग“ज“ के थे गल गए बह गए मगर वो सारे हफर्’ जो उन पर तूने लिखे थे वो सब अब तक दरिया में तैर रहे हैं।

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समन्दर

एक मुकम्मल किनारे की तलाश में हर रोज कितने किनारे बदलता है समन्दर तमाम नदियों को जज्“ब करने के बाद भी मासूम सा दिखता है समन्दर। शाम होते ही सूरज को अपनी मुट्ठी में छुपाकर सबको परेशान करता है समन्दर। …बड़ा सफ़ेद पोश है ये समन्दर। (पुरी के समन्दर...

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तहरीरें

एक वादा तुमसे रोज’ कुछ लिखने का तुम्हारे बारे में, अभी भी मुस्तैदी से निभा रहा हूँ। मगर इस बार तहरीरें काग’जों पर नहीं दिल के सफ’हों पे लिख रहा हूँ …पढ़ सकोगी तुम?

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दर्द कौन समझेगा

तूने बख़्शा तो है मुझे खुला आसमां साथ ही दी हैं तेज’ हवाएं भी हाथों से हल्की जुम्बिश देकर जमीं से ऊपर उठा भी दिया है। मगर ये सब कुछ बेमतलब सा लगता है, ये आस्मां, ये हवाएं, ये हल्की सी जुम्बिश। काश! तूने ये कुछ न दिया होता...

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तुम्हारी तरह

हवा जो छू के गुज’रती है मुझे उसमें खुश्बू बसी है तुम्हारी तरह। ये नदिया जो बहती है इसमें इक सादगी है तुम्हारी तरह। रंग धानी है हरसू बिखरा हुआ इस ज’मीं का है ये पैरहन है तुम्हारी तरह। बे मक’सद हैं राहें यहाँ की सभी मगर चलती जातीं...

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लम्हों की तलाश

वो लम्हा मेरी मुट्ठी से रेत की तरह फिसल गया ऐसा लगा कि मुझसे कोई ‘मैं’ कहीं निकल गया। ढूँढ़ता हूँ उसी टुकड़े को हरेक शख़्स के वजूद में …शायद यह तलाश ताउम्र जारी रहेगी।

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ख़्वाब

ख़्वाब शीशे के टुकड़े हैं टूटते हैं तो पलकें लहूलुहान हो जाती हैं मैं इस डर से कभी आँखों में ख़्वाब नहीं सजाता हूँ।

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हाशिया

बेसबब पहले काग“ज’ पे वो हाशिया खींच देता है और उसपे ये दावा कि वो बंदिशों में लिखने का आदी नहीं है!

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मसूरी

मसूरी एक निहायत खूबसूरत दोशीजा जिसके माथे पर सूरज की लाल बिन्दी है, तो तमाम तराशे हुए कुहसार उसके अल्हड़पन के गवाह हैं। मसूरी! जब सुबह चांदी के वरक’ से ढके बादलों की चूनर ओढ़ती है तो और भी खूबसूरत हो जाती हे कैम्पटी फॉल के नग्“मात के साथ...

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