Archive for Category: ग़ज़लें

आहटें

करीब पांच साल के बाद शायर पवन कुमार का नया मजमुआ ‘आहटें’ हमारे हाथ में है। 2012 में आई अपनी पहली किताब ‘वाबस्ता’ के हवाले से शायरी की जो नई बुनियाद हमारे बीच रखी गयी थी, उस पर घरौंदा बताने हुए ‘आहटें’ हमारे बीच है। किताब की शक्ल-ओ-सूरत की...

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सिर्फ ज़रा सी जि’द की ख़ातिर अपनी जाँ से गुज’र गए

सिर्फ ज़रा सी जि’द की ख़ातिर अपनी जाँ से गुज’र गए एक शिकस्ता कश्ती लेकर हम दरिया में उतर गए तन्हाई में बैठे बैठे यूँ ही तुमको सोचा तो भूले बिसरे कितने मंज’र इन आँखों से गुज़र गए जब तक तुम थे पास हमारे नग्मा रेज़ फ’ज़ाएँ थीं और...

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हम तुम हैं आधी रात है और माहे-नीम है

हम तुम हैं आधी रात है और माहे-नीम है क्या इसके बाद भी कोई मंज“र अज़ीम है लहरों को भेजता है तकाजे के वास्ते साहिल है कर्जदार समंदर मुनीम है वो खुश कि उसके हिस्से में आया है सारा बाग“ मैं ख़ुश कि मेरे हिस्से में बादे-नसीम है क्या...

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कुछ लतीफों को सुनते सुनाते हुए

कुछ लतीफों को सुनते सुनाते हुए उम्र गुज’रेगी हंसते हंसाते हुए अलविदा कह दिया मुस्कुराते हुए कितने ग“म दे गया कोई जाते हुए सारी दुनिया बदल सी गयी दोस्तो आँख से चंद पर्दे हटाते हुए सोचता हूँ कि शायद घटें दूरियां दरमियां फासले कुछ बढ़ाते हुए एक एहसास कुछ...

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उतरा है ख़ुदसरी पे वो कच्चा मकान अब

उतरा है ख़ुदसरी पे वो कच्चा मकान अब लाजिम़ है बारिशों का मियां इम्तिहान अब मुश्किल सफ’र है कोई नहीं सायबान अब है धूप रास्तों पे बहुत मेहरबान अब कुर्बत के इन पलों में यही सोचता हूँ मैं कुछ अनकहा है उसके मिरे दर्मियान अब याद आ गयी किसी...

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एक ग़ज़ल मेरी भी

लफ्ज़ पत्रिका ग़ज़लों को प्रकाशित करने वाली त्रैमासिक पत्रिका है। ये पत्रिका दिल्ली से प्रकशित होती है । इसके सम्पादक तुफैल चतुर्वेदी हैं जो मेरे मित्र भी हैं। आज जितनी भी पत्रिकाएं ग़ज़लों को प्रकाशित करने की दिशा में काम कर रही हैं उनमे इस पत्रिका का नाम काफी...

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